गुरुवार, 23 सितंबर 2010

मैं इंसान हूँ,

कुछ पाने कि चाह, कुछ खोने का गम,
 यही सब रहा जिन्दगी भर वहम !
बहुत कुछ यहाँ है पर कुछ भी नहीं,
 बहुत देर हुई फिर ये टूटा भरम !

 जो खुद तक ही सिमटे, वो पहचान हूँ,
यही सब बजह है कि मैं इंसान हूँ!

खुद से ही लड़ना और फिर हार जाना,
बंधती उम्मीदों को फिर मार जाना!
कभी तंगदिल तो कभी संगदिल मैं,
मुश्किल रहा खुद से खुद पार पाना!

खुबसूरत है दुनिया, मैं वीरान हूँ,
यही सब बजह है कि मैं इंसान हूँ!

शबनम कि बूंदों से मोती कि आस,
 दरख्तों के ठूंठों से जीवन कि आस!
 खुदगर्ज़ हूँ, सबकुछ मुझको मिले,
समंदर में हूँ, पर फिर भी है प्यास!

खुद कि खुदी से मैं हैरान हूँ,
यही सब बजह है कि मैं इंसान हूँ!

जीवन कि कीमत लगता रहा,
 खुद से ही खुद को छुपाता रहा!
 कभी फलसफा तो कभी जुस्तजू,
दुनिया को ये सब बताता रहा!

 दुनिया कि नियत से मैं अंजान हूँ,
 यही सब बजह है कि मैं इंसान हूँ,